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कांग्रेसी नहीं जुटा पाए कमलनाथ की गरिमानुरूप भीड़, खाली कुर्सियां को निहारते रहे साहब के नयन

बालाघाट। इस बार लोक सभा चुनाव बालाघाट-सिवनी संसदीय सीट पर जारी चुनावी घमासान में जाति और चेहरों से ज्यादा अब मुद्दों पर फोकस किया जा रहा है। कांग्रेस भाजपा की नाकामयाबियां गिनाते हुए जमीनी मुद्दे उठाने में अभी भी काफी पीछे नजर आ रही है। हालांकि कांग्रेस का सबसे ज्यादा खराब प्रदर्शन लोकसभा चुनाव 2004 में रहा था, जहां कांग्रेस चौथे पायदान पर रही थी।

देखने में आ रहा है कि लोकसभा 2019 भी कांग्रेस 2004 की तर्ज पर लड़ रही है। पिछले दो दशकों से ज्यादा समय से इस पर भाजपा का कब्जा रहा है और भाजपा अपने गढ़ को बचाने के लिए तमाम प्रयास करने में जी जान से जुटी है। भाजपा के भीतर भारी बगावत के बाद भी भाजपा डेमेज कंट्रोल करते हुये आगे बढ़ रही है और लोकसभा चुनाव की पूरी कमान फिलहाल पूर्व कृषि मंत्री गौरीशंकर बिसेन संभाले हुए हैं। भाजपा में हुए दो गुट तथा भाजपा सांसद के बागी प्रत्याशी होने के बाद अंदाजा लगाया जा रहा है कि इससे कांग्रेस को फायदा होगा, लेकिन कांग्रेस के लिए अभी भी बालाघाट-सिवनी लोकसभा सीट कड़ी चुनौती बनी हुई है।

इसका सबसे बड़ा कारण कांग्रेस का चुनावी प्रबंधन माना जा रहा है, इसी कमजोर चुनावी प्रबंधन का असर 16 अप्रैल को परसवाड़ा विधानसभा के सबसे बड़े क्षेत्र हट्टा में मुख्यमंत्री के आगमन एवं सभा में देखने को मिला, जहां सैकड़ों कुर्सियां खाली पड़ी रह गई। प्रदेश में कांग्रेस की सरकार और कमलनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके प्रथम बालाघाट आगमन को लेकर लग रहा था कि हट्टा में लोगों का हुजूम लगेगा लेकिन कांग्रेसी आशातीत भीड़ जुटाने में पूरी तरह असफल रहे। जिसे देखकर लग रहा है कि यह लोकसभा चुनाव कहीं कांग्रेस बहुत बड़े अंतर से न हार जाए। प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ का नाम कांग्रेस के शिर्ष नेताओं में है और अधिकतर देखा भी जाता है कि नाथ साहब की सभाओं में हमेशा ऐतिहासिक भीड़ रहती है, लेकिन उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद लोकसभा चुनाव जैसे माहौल में कांग्रेसी उनकी गरिमानुरूप भीड़ हट्टा की सभा में नहीं जुटा पाए। जबकि यह क्षेत्र दो विधानसभाओं के बीचो-बीच पड़ता है।

जिले के लोगों को और मीडिया को उम्मीद थी कि मुख्यमंत्री के प्रथम आगमन पर नाथ साहब को सुनने ऐतिहासिक भीड़ हट्टा के मैदान में जमा होगी। लेकिन नजारा इसके विपरित ही नजर आया। देखने में आया कि बालाघाट, परसवाड़ा, लांजी-किरनापुर, बैहर विधानसभाआें से आया जनसमूह 2 हजार के स्कोर तक भी नहीं पहुंच पाया। हट्टा का खेल मैदान जहां यह सभा थी काफी बड़ा है लेकिन बहुत कम जगह में टेंट लगाकर स्टेज के सामने लगभग 17-18 सौ कुर्सियां लगवाई गई थी जिसमें से 500 से ज्यादा कुर्सियां खाली रही, जिसे कमलनाथ जी के नयन निहारते रहे। सभा में जनता की कमी को देखते हुये मुख्यमंत्री नाथ ने भी कुछ ज्यादा नहीं कहा और अपने भाषण में नरमी दिखाते हुये जल्द अपना वक्तव्य खत्म कर दिया। जबकि इस आयोजन को संपन्न कराने के लिये विधानसभा उपाध्यक्ष हिना कावरे के उपर पूरी जिम्मेदारी थी।

इनके साथ संजय उईके बैहर विधायक तथा पूर्व परसवाड़ा विधायक एवं लोकसभा प्रत्याशी मधु भगत की पूरी टीम 3 दिनों से इस सभा के लिये मेहनत कर रही थी, साथ ही कांग्रेस के बड़े-बड़े स्वयंभू नेता पूरे दमखम के साथ जुटे हुये थे फिर भी कामयाब नहीं हो सके। भीड़ जुटाने संसाधन के लिये मिले धन को भीड़ जुटाने में लगाने के बजाय इन लोगों ने बंदरबांट ज्यादा किया। जिसकी परिणीति यह रही कि हट्टा की कमलनाथ की सभा फ्लाप हो गई।

वहीं खनिज मंत्री गुड्डा उर्फ प्रदीप जायसवाल भी कर्मभूमि वारासिवनी में गुड्डा एवं उनकी टीम की मेहनत साफ नजर आयी। यहां कमलनाथ की सभा में आशानुरूप से भी ज्यादा की भीड़ जुटाने में खनिज मंत्री प्रदीप जायसवाल एवं उनकी टीम पूरी तरह कामयाब रही तथा वारासिवनी में आयोजित मुख्यमंत्री कमलनाथ की सभा ऐतिहासिक रही। इसका सबसे बड़ा कारण यह रहा कि काफी कम समय में खनिज मंत्री एवं उनके सहयोगी कार्यकर्ताओं ने पूरी ईमानदारी के साथ मेहनत करते हुए काम किया।

जिले के 6 विधानसभाओं में भी सबसे मजबूत टीम और टीमवर्क गुड्डा जायसवाल का माना जाता है उनके टीम के कार्यकर्ताओं की ही मेहनत थी कि उन्होंने टिकट नहीं मिलने के बाद भी गुड्डा जायसवाल को निर्दलीय चुनाव लड़ाकर जीता दिया और वे आज खनिज मंत्री हैं। अगर ऐसी ही मेहनत से बाकी के 5 विधानसभाओं के कार्यकर्ता वर्तमान विधायक पूर्व विधायक एवं विधानसभा उपाध्यक्ष ईमानदारी से मेहनत करे तो कांग्रेस की इस लोकसभा चुनाव में जीत सुनिश्चित हो सकती है।

रिपोर्ट: रितेश सोनी

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